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जंगल मे लकड़ी बीनने वाली लड़की ओलंपिक्स से सिल्वर मेडल ले आई, संघर्षों से भरी है मीराबाई चानू की कहानी

Saturday, July 24, 2021 | Saturday, July 24, 2021 WIB

करीब 14 साल पहले की बात है. लल्लन टॉप में छपि कहानी के मुताबिक, मणिपुर की राजधानी इम्फाल से लगभग 20 किलोमीटर दूर एक गांव की पहाड़ियों पर दो बच्चे पसीने से तरबतर खड़े थे. 


जलावन की लकड़ियां लेने घर से निकले 16 साल के सनातोम्बा मीटी और उनकी 12 साल की बहन की समझ नहीं आ रहा था, कि अब करें  तो  क्या करें. आसपास कोई मदद करने वाला भी नहीं था और सनातोम्बा से लकड़ियों का गट्ठर उठ नहीं पा रहै था. तभी उनकी बहन ने कहा, ‘मैं उठाऊं क्या?’




पहले तो सनातोम्बा समझ नहीं पाए कि उसे क्या जवाब दें. जो गट्ठर उनसे नहीं उठ रहा, वो पूरे चार साल छोटी बहन कैसे उठाएगी? लेकिन कोई और चारा ना देख सनातोम्बा ने हां कर दी. और फिर जो हुआ उसने उस 12 साल की लड़की को ओलंपिक तक पहुंचा दिया. ये बात और है कि अब 26 साल की हो चुकी वो लड़की साल 2016 के रियो ओलंपिक्स को याद नहीं करना चाहती.ये लड़की कोई और नहीं बल्की मीराबाई चानू ही थी.


टोक्यो ओलंपिक (Tokyo Olympics) के दूसरे दिन भारत की वेटलिफ्टर मीराबाई चानू (Mirabai Chanu) ने देश को पहला मेडल दिला दिया है. इसके साथ उन्होंने ओलंपिक खेलों की भारोत्तोलन स्पर्धा में पदक के लिए भारत का 21 सालों के लंबे इंतजार को खत्म कर दिया है.  


मीराबाई चानू ने महिलाओं की 49 किग्रा वर्ग में क्लीन एंड जर्क में सिल्वर मेडल अपने नाम किया है. चानू ने कुल 202 किलोग्राम का भार उठाकर भारत को यह मेडल दिलाया है.


कहते हैं कि किसी भी जीत के पीछे कड़ी मेहनत छिपी होती है. मीराबाई (History of Mirabai Chanu) ने भी इस मेडल को जीतने के लिए जी जान लगा दिया था। वह ऐसे स्टेज से ऊपर उठी हैं जहां से उठने में लोगों को लंबा वक्त लग जाता है.


मणिपुर की मीराबाई चानू (Story of Mirabai Chanu) ने यकीनन भारत का नाम अंतरराष्ट्रीय पटल पर रौशन कर दिया है हालांकि वह पहले भी कई बार अपनी काबिलियत के दम पर देश को फख्र का मौका दे चुकी हैं लेकिन उनके लिए ये मुकाम हासिल करना इतना आसान न था. अपने सपनों को पूरा करने के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा है तब जाकर आज उन्हें ये बुलंदी हासिल हुई है. 


इस पूरे सफर के दौरान चानू को उनके परिवार का पूरा सहयोग मिला. परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के बावजूद उनके माता-पिता ने हर कठिनाई का सामना करते हुए चानू की आहार संबंधी जरूरतों से लेकर कई अन्य जरूरते पूरी की. उसी का नतीजा है कि चानू लगातार अपने परिवार और देश का नाम ऊंचा कर रही हैं.  

 चानू का जन्म 8 अगस्त 1994 को इम्फाल में हुआ था. 26 वर्षीय मीराबाई चानू को बचपन में तीरंदाजी का शौक था और वो इसी में अपना करियर भी बनाना चाहती थी. लेकिन 8वीं कक्षा के बाद उनका झुकाव वेटलिफ्टिंग की ओर हो गया और फिर उन्होंने इसी में आगे बढ़ने का फैसला किया. 


  • 11 साल की उम्र में जीता था पहला स्वर्ण पदक

चानू ने 11 साल की उम्र में एक लोकल वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में अपना पहला स्वर्ण पदक जीता था. बाद में, उन्होंने विश्व और एशियाई जूनियर चैंपियनशिप प्रतिस्पर्धा में भाग लेकर अपने अंतर्राष्ट्रीय भारोत्तोलन करियर की शुरुआत की, जहां उन्होंने दोनों में पदक जीते.


मीराबाई चानू अब तक देश के लिए कई मेडल जीत चुकी हैं. साल 2014 में ग्लासगो में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में उन्होंने सिल्वर मेडल अपने नाम किया था. 2016 के रियो ओलंपिक गेम्स के क्वालीफाई मैच में चानू ने अपनी प्रेरणा वेटलिफ्टर कुंजरानी को हराकर रियो ओलंपिक्स में अपनी जगह बनाई थी. 


मीराबई ने 2017 में हुई वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में 48 किलोग्राम वर्ग में गोल्ड मेडल जीता था. वहीं 2018 में कॉमन वेल्थ गेम्स में भी चानू ने गोल्ड मेडल अपने नाम किया था. अप्रैल 2021 में ताशकंद में एशियाई भारोत्तोलन चैंपियनशिप के दौरान, मीराबाई चानू ने महिलाओं की 49 किग्रा क्लीन एंड जर्क में 119 किग्रा भार उठाकर एक नया विश्व रिकॉर्ड बनाया था.  दूसरी ओर, चानू को स्नैच में खराब प्रदर्शन के कारण एशियाई मीट में कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा था.


  • चानू का स्वाभिमान-

मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने चानू को सम्मानित किया और उन्हें 20 लाख रुपये का पुरस्कार दिया. इसके अलावा आपको बता दें कि चानू को 2018 में भारत के सर्वोच्च नागरिक खेल सम्मान राजीव गांधी खेल रत्न से सम्मानित किया गया था. इसके अलावा चानू को 2018 में भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से भी सम्मानित किया जा चुका 





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